छत्तीसगढ़

Chhattisgarh High Court:-रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड से ही वैध नहीं होता ‘हिबा’, कब्जे की सुपुर्दगी जरूरी; छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने निचली अदालत का फैसला रखा बरकरार

Chhattisgarh High Court:-रायपुर। मुस्लिम कानून के तहत संपत्ति के ‘हिबा’ यानी उपहार को लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। कोर्ट ने कहा कि केवल गिफ्ट डीड का पंजीयन हो जाने से हिबा अपने आप वैध साबित नहीं हो जाता। वैध हिबा के लिए दानकर्ता की स्पष्ट घोषणा, उपहार प्राप्त करने वाले की स्वीकृति और संपत्ति के कब्जे की वास्तविक या प्रभावी सुपुर्दगी जरूरी है।

यह मामला रायपुर के पुरैना-तेलीबांधा क्षेत्र की करीब 1,500 वर्गफीट संपत्ति से जुड़े पारिवारिक विवाद का है। मामले में मृतक नौशाद अली की पत्नी नसीमा अली और उनके दो बच्चों की ओर से संपत्ति पर अपने कब्जे और अधिकार को लेकर निचली अदालत में सिविल वाद दायर किया गया था।

विवादित संपत्ति के संबंध में 27 मार्च 2019 को रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड के जरिए संपत्ति को दान किए जाने का दावा किया गया। इसके बाद नामांतरण की प्रक्रिया भी हुई। दूसरी ओर, वादी पक्ष का कहना था कि संपत्ति के एक हिस्से में उनका लंबे समय से वास्तविक कब्जा था और मकान का निर्माण भी उनके परिवार की ओर से किया गया था।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह था कि क्या रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड के आधार पर मुस्लिम कानून के तहत वैध ‘हिबा’ पूरा हुआ था।

Chhattisgarh High Court:-हिबा के लिए तीन शर्तें जरूरी

मुस्लिम कानून के तहत हिबा के तीन प्रमुख तत्व माने जाते हैं—

  1. दानकर्ता द्वारा उपहार की घोषणा
  2. उपहार प्राप्तकर्ता द्वारा स्वीकृति
  3. उपहार की गई संपत्ति के कब्जे की सुपुर्दगी

अदालत ने इसी तीसरे तत्व यानी कब्जे के प्रभावी हस्तांतरण को मामले में महत्वपूर्ण माना। उपलब्ध न्यायिक सिद्धांतों के अनुसार केवल दस्तावेज में यह लिख देना कि कब्जा सौंप दिया गया है, हर स्थिति में पर्याप्त नहीं होता। यह भी देखा जा सकता है कि उपहार प्राप्तकर्ता ने वास्तव में संपत्ति पर नियंत्रण और कब्जा हासिल किया या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने भी अक्टूबर 2025 के एक फैसले में हिबा की वैधता के लिए इन तीनों तत्वों और कब्जे के समकालीन एवं लगातार प्रमाण के महत्व को दोहराया था।

Chhattisgarh High Court:-कब्जे के सबूत पर टिका विवाद

रिपोर्ट किए गए मामले में वादी पक्ष संपत्ति के करीब 370 वर्गफीट हिस्से पर पहले से काबिज था। अदालत के समक्ष यह सवाल था कि क्या पूरी संपत्ति का वास्तविक और प्रभावी कब्जा गिफ्ट डीड के लाभार्थियों को सौंपा गया था।

कोर्ट ने पाया कि दस्तावेज में कब्जा देने का उल्लेख होने के बावजूद वास्तविक कब्जे के हस्तांतरण को साबित करने के लिए पर्याप्त ठोस साक्ष्य सामने नहीं रखे जा सके। ऐसे में केवल पंजीकृत दस्तावेज के आधार पर हिबा को पूर्ण और वैध मानने का आधार नहीं बनता।

Chhattisgarh High Court:-‘मुशा’ का भी आया संदर्भ

मामले में संपत्ति को एक से अधिक व्यक्तियों के पक्ष में संयुक्त रूप से दिए जाने और प्रत्येक व्यक्ति का हिस्सा स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं होने के कारण मुस्लिम कानून के ‘मुशा’ सिद्धांत का भी संदर्भ आया। हालांकि, अदालत ने इसे हर मामले में स्वतः लागू होने वाला नियम नहीं माना।

इस मामले में हिबा की वैधता का फैसला केवल ‘मुशा’ के आधार पर नहीं, बल्कि कब्जे की प्रभावी सुपुर्दगी साबित नहीं होने और वादी पक्ष के संपत्ति के एक हिस्से पर लगातार कब्जे समेत मामले की समग्र परिस्थितियों के आधार पर किया गया।

Chhattisgarh High Court:-लंबे समय से कब्जे वाले व्यक्ति को जबरन नहीं हटाया जा सकता

अदालत ने यह भी माना कि किसी व्यक्ति के लंबे समय से शांतिपूर्ण कब्जे में होने की स्थिति में उसे केवल किसी विवादित दस्तावेज के आधार पर जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता। यदि दूसरे पक्ष का संपत्ति पर बेहतर अधिकार है तो उसे कानून के अनुसार उचित न्यायिक राहत लेनी होगी।

इस आधार पर निचली अदालत द्वारा वादी पक्ष के कब्जे की सुरक्षा के लिए दी गई राहत को बरकरार रखा गया।

Chhattisgarh High Court:-हाई कोर्ट ने अपील खारिज की

मामले में निचली अदालत के फैसले और डिक्री में हस्तक्षेप से हाई कोर्ट ने इनकार कर दिया और प्रथम अपील खारिज कर दी। इस तरह विवादित गिफ्ट डीड को वादी पक्ष के खिलाफ प्रभावी न मानने तथा उनके कब्जे में हस्तक्षेप पर रोक लगाने संबंधी निचली अदालत का आदेश बरकरार रहा।

कानूनी तौर पर इस फैसले का अहम संदेश यह है कि मुस्लिम कानून के तहत हिबा की वैधता केवल रजिस्टर्ड दस्तावेज से तय नहीं होती। घोषणा और स्वीकृति के साथ संपत्ति के कब्जे की वास्तविक या प्रभावी सुपुर्दगी भी महत्वपूर्ण है।

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