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Supreme Court:-कस्टडी की लड़ाई में POCSO का इस्तेमाल? सुप्रीम कोर्ट ने लगाई जल्दबाजी में गिरफ्तारी पर रोक, जारी किए सख्त दिशा-निर्देश

Supreme Court:-पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद और बच्चे की कस्टडी की लड़ाई में POCSO कानून के संभावित दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में केवल FIR दर्ज हो जाने के आधार पर आरोपी माता-पिता या बच्चे के साथ रहने वाले परिवार के सदस्य की रूटीन या जल्दबाजी में गिरफ्तारी नहीं की जानी चाहिए। गिरफ्तारी से पहले बच्चे का विशेषज्ञ मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सकीय मूल्यांकन कराया जाना जरूरी होगा।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने 24 सितंबर 2026 को ‘R’ बनाम ‘E’ एवं अन्य मामले में ये दिशा-निर्देश जारी किए। कोर्ट ने एक ऐसे मामले में POCSO FIR को भी रद्द किया, जिसमें कस्टडी विवाद के बीच पिता पर नाबालिग बेटी के यौन शोषण का आरोप लगाया गया था। CBI जांच के बाद कोर्ट ने आरोपों को अभियोजन के लिए टिकाऊ नहीं माना और बच्ची की कानूनी कस्टडी पिता के पास रखने का आदेश दिया।

Supreme Court:-क्या था पूरा मामला?

यह मामला लंबे समय से चल रहे वैवाहिक और कस्टडी विवाद से जुड़ा था। पति-पत्नी के बीच बच्चे की कस्टडी को लेकर कानूनी लड़ाई चल रही थी। इसी दौरान मां की ओर से पिता के खिलाफ FIR नंबर 76/2024 दर्ज कराई गई, जिसमें बच्ची के यौन शोषण का आरोप लगाया गया।

मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने CBI जांच कराई। जांच में CCTV फुटेज, गवाहों, फोरेंसिक सामग्री और विशेषज्ञ मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन सहित कई पहलुओं की जांच की गई। CBI ने आरोपों को विश्वसनीय और पर्याप्त रूप से पुष्ट नहीं पाया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने FIR को रद्द कर दिया।

Supreme Court:-सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े कुछ POCSO मामलों में पुलिस और विशेष अदालतों के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय तय किए हैं। खास तौर पर तब, जब आरोपी बच्चे का माता-पिता या उसके साथ रहने वाला परिवार का सदस्य हो और बच्चे के माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद चल रहा हो।

1. FIR का मतलब सीधे गिरफ्तारी नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि POCSO FIR दर्ज होना अपने आप गिरफ्तारी का आधार नहीं बन सकता। जांच अधिकारी को BNSS की धारा 35 के तहत गिरफ्तारी के लिए जरूरी कानूनी आधार और परिस्थितियों पर विचार करना होगा।

2. बच्चे का विशेषज्ञ मूल्यांकन जरूरी

ऐसे मामलों में गिरफ्तारी पर फैसला लेने से पहले जांच अधिकारी को Child Psychiatry या Clinical Psychology के विशेषज्ञ की मदद लेनी होगी। विशेषज्ञ का चयन जिला बाल संरक्षण इकाई यानी DCPU से परामर्श के जरिए किया जाएगा। जहां DCPU उपलब्ध नहीं है, वहां जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की मदद ली जा सकती है।

3. विशेषज्ञ की रिपोर्ट पर गंभीरता से विचार

विशेषज्ञ की रिपोर्ट गिरफ्तारी का अकेला आधार नहीं होगी, लेकिन जांच अधिकारी को उपलब्ध दूसरे सबूतों के साथ इस रिपोर्ट पर भी गंभीरता से विचार करना होगा। यानी विशेषज्ञ की राय जांच का हिस्सा होगी, अंतिम फैसला नहीं। कुछ असाधारण परिस्थितियों में, यदि उपलब्ध सामग्री स्पष्ट हो, तो अधिकारी विशेषज्ञ मूल्यांकन से अलग भी जा सकता है, लेकिन इसके कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे।

4. सीधे कोर्ट में शिकायत होने पर भी सावधानी

अगर ऐसे मामले में माता-पिता सीधे विशेष POCSO कोर्ट में शिकायत दाखिल करते हैं, तो अदालत को संज्ञान लेने और आरोपी को समन जारी करने से पहले बच्चे का विशेषज्ञ मूल्यांकन कराना होगा। हालांकि असाधारण परिस्थितियों में, स्पष्ट सामग्री मौजूद होने पर अदालत भी कारण दर्ज करते हुए इस प्रक्रिया से अलग जा सकती है।

Supreme Court:-दिशा-निर्देश सिर्फ भविष्य के मामलों के लिए नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने इन सुरक्षा उपायों को उन जांचों पर भी लागू करने का निर्देश दिया है जो 24 सितंबर 2026 को फैसला आने के समय लंबित थीं। वहीं निजी शिकायतों के मामले में ये निर्देश उन मामलों पर लागू होंगे, जिनमें अभी तक समन जारी नहीं हुए हैं।

Supreme Court:-कोर्ट ने क्यों जताई चिंता?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि माता-पिता के बीच चल रहे विवाद में बच्चे को इस तरह की कानूनी लड़ाई के बीच लाना उसके मानसिक स्वास्थ्य और माता-पिता के रिश्ते पर गंभीर असर डाल सकता है। कोर्ट का जोर इस बात पर रहा कि बच्चे का हित, उसकी गरिमा और मानसिक सुरक्षा सबसे ऊपर होनी चाहिए।

साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इन सुरक्षा उपायों का उद्देश्य वास्तविक यौन अपराधों की जांच को कमजोर करना नहीं है, बल्कि वैवाहिक विवाद की विशेष परिस्थितियों में बिना पर्याप्त आधार के जल्दबाजी में गिरफ्तारी और कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सार

POCSO की FIR गंभीर है, लेकिन वैवाहिक कस्टडी विवाद में FIR = स्वतः गिरफ्तारी नहीं। अब ऐसे विशेष मामलों में गिरफ्तारी से पहले बच्चे के मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन और उपलब्ध साक्ष्यों की समग्र जांच पर जोर रहेगा।

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