High Court:-दूसरे राज्य से ऐसे नहीं उठा सकती पुलिस! ट्रांजिट रिमांड बिना गिरफ्तारी पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, साइबर ठगी आरोपी को मिली राहत

High Court:-व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गिरफ्तारी की कानूनी प्रक्रिया को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को दूसरे राज्य से गिरफ्तार कर बिना ट्रांजिट रिमांड के छत्तीसगढ़ लाना कानून और संविधान दोनों के खिलाफ है। अदालत ने साइबर ठगी के आरोपी जितेश आनंद उर्फ जीतू की 28 जून से 30 जून 2026 तक की हिरासत को अवैध घोषित करते हुए उसे राहत दी।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पुलिस के नियंत्रण में आ जाती है, उसी क्षण से संविधान के अनुच्छेद 21 और 22(2) के तहत उसे मिलने वाले सभी सुरक्षा अधिकार लागू हो जाते हैं। ऐसे में ट्रांजिट रिमांड लिए बिना दूसरे राज्य से लाकर हिरासत में रखना वैध नहीं माना जा सकता।
High Court:-21 लाख से ज्यादा की साइबर ठगी का मामला
यह मामला सरगुजा रेंज के साइबर थाना में दर्ज 21.15 लाख रुपये की साइबर ठगी से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार, निवेशक को शेयर बाजार में अधिक मुनाफा दिलाने का झांसा देकर रकम ठगी गई थी। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(4), 3(5) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66-D के तहत अपराध दर्ज किया था।
High Court:-रिमांड आदेश भी किया निरस्त
हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी को बिना ट्रांजिट रिमांड के छत्तीसगढ़ लाया गया था। इस कारण अदालत ने 30 जून और 3 जुलाई 2026 को अंबिकापुर के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी द्वारा जारी रिमांड आदेशों को भी निरस्त कर दिया। कोर्ट ने आरोपी को 5 लाख रुपये के निजी मुचलके और समान राशि की दो जमानतों पर रिहा करने का निर्देश दिया।
High Court:-पुलिस की दलील कोर्ट ने नहीं मानी
राज्य की ओर से दलील दी गई कि आरोपी अपनी इच्छा से छत्तीसगढ़ आया था, इसलिए ट्रांजिट रिमांड की आवश्यकता नहीं थी। लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति पुलिस के प्रभावी नियंत्रण में है, तो उसे कानूनन गिरफ्तार माना जाएगा और उसके सभी संवैधानिक अधिकार लागू होंगे।
High Court:-हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना संवैधानिक अनिवार्यता है। यदि प्रारंभिक हिरासत ही अवैध है, तो उसके आधार पर बाद में लिया गया रिमांड भी कानूनी रूप से टिक नहीं सकता। यह फैसला भविष्य में अंतरराज्यीय गिरफ्तारियों के दौरान पुलिस एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है।
