CG News:-बंदूक छोड़ी तो नई जिंदगी का रास्ता खुला, पुराने केस पर कानून की कसौटी बरकरार

CG News:-रायपुर। छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वालों के पुनर्वास के साथ उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों की समीक्षा के लिए भी व्यवस्था की गई है। राज्य सरकार की ‘नक्सलवादी आत्मसमर्पण/पीड़ित राहत पुनर्वास नीति-2025’ का उद्देश्य आत्मसमर्पित नक्सलियों को शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास और वित्तीय सहायता के जरिए समाज की मुख्यधारा से जोड़ना है। नीति के तहत जिलों में पुनर्वास समितियों के गठन का भी प्रावधान किया गया है।
लेकिन इस नीति का मतलब यह नहीं है कि किसी व्यक्ति के आत्मसमर्पण करते ही उसके खिलाफ दर्ज सभी आपराधिक मामले स्वतः खत्म हो जाएंगे। केस वापसी के लिए अलग कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी होगी और अंतिम निर्णय न्यायालय की सहमति पर निर्भर करेगा।
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CG News:-पहले होगी मामलों और आचरण की समीक्षा
आत्मसमर्पण करने वाले व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मामलों की प्रकृति, अपराध की गंभीरता, आत्मसमर्पण के बाद उसके आचरण और नक्सली गतिविधियों से उसकी वास्तविक दूरी जैसे पहलुओं को देखा जाएगा। इसके बाद निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत मामले की समीक्षा और अभियोजन वापसी का प्रस्ताव आगे बढ़ सकता है।
राज्य सरकार ने दिसंबर 2025 में आत्मसमर्पित नक्सलियों के खिलाफ लंबित मामलों को लेकर जिला स्तर की समिति और मंत्रिमंडलीय उप-समिति के माध्यम से प्रक्रिया आगे बढ़ाने का फैसला किया था। उस समय सरकार की ओर से इसे आत्मसमर्पित लोगों को मुख्यधारा में लाने की नीति का हिस्सा बताया गया था।
CG News:-केस वापसी में सबसे अहम है कोर्ट की मंजूरी
कानूनी तौर पर अभियोजन से वापसी का प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 360 में है। यह प्रावधान पुराने CrPC की धारा 321 के स्थान पर आया है। India Code में धारा 360 को स्पष्ट रूप से “Withdrawal from prosecution” के रूप में दर्ज किया गया है।
इस प्रक्रिया में लोक अभियोजक अभियोजन वापस लेने का आवेदन कर सकता है, लेकिन न्यायालय की सहमति आवश्यक होती है। कोर्ट यह देखता है कि अभियोजन वापस लेने का फैसला कानून और न्याय के अनुरूप है या नहीं तथा कहीं इसका इस्तेमाल न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए तो नहीं किया जा रहा।
CG News:-अप्रैल 2026 में हाईकोर्ट ने भी दोहराया यही सिद्धांत
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 22 अप्रैल 2026 के एक आदेश में BNSS की धारा 360 के तहत अभियोजन वापसी के इसी कानूनी सिद्धांत को दोहराया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन वापस लेने की शक्ति का इस्तेमाल यांत्रिक तरीके से नहीं किया जा सकता। लोक अभियोजक को स्वतंत्र रूप से अपना मत बनाना होगा और न्यायालय को यह संतुष्ट होना होगा कि वापसी सद्भावना, न्याय और जनहित में है तथा कानून की प्रक्रिया को बाधित करने के उद्देश्य से नहीं है।
इस मामले में हाईकोर्ट ने राज्य को अभियोजन वापसी के लिए अनुमति दी, लेकिन संबंधित ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह आवेदन पर अपने स्तर पर कानून के अनुसार फैसला करे। यानी हाईकोर्ट की अनुमति भी अपने आप केस खत्म नहीं करती; अंतिम प्रक्रिया संबंधित न्यायालय के समक्ष पूरी होती है।
CG News:-गंभीर अपराधों में जांच और भी अहम
इस पूरी व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि आत्मसमर्पण और आपराधिक मामले दो अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। पुनर्वास नीति आत्मसमर्पित व्यक्ति को मुख्यधारा में लौटने का अवसर देती है, लेकिन इससे किसी अपराध में स्वतः दोषमुक्ति नहीं मिलती।
किसी मामले में अभियोजन वापसी उचित है या नहीं, यह तय करते समय अपराध की प्रकृति और गंभीरता, उपलब्ध सामग्री, सार्वजनिक हित और न्यायिक प्रक्रिया पर उसके प्रभाव जैसे पहलुओं को ध्यान में रखना होगा।
