Chhattisgarh High Court:-रजिस्ट्री आदिवासी के नाम, कब्जा गैर-आदिवासी का? हाईकोर्ट ने कहा- धारा 170-B में होगी असली कब्जे की जांच

Chhattisgarh High Court:-बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आदिवासी भूमि से जुड़े एक अहम मामले में साफ किया है कि किसी जमीन का रजिस्टर्ड बिक्री विलेख आदिवासी व्यक्ति के नाम होने मात्र से उस जमीन के वास्तविक कब्जे और उपयोग की जांच नहीं रोकी जा सकती। कोर्ट ने माना कि छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 170-B के तहत राजस्व अधिकारी यह जांच कर सकते हैं कि जमीन वास्तव में किसके कब्जे और उपयोग में है और आदिवासी भूमि गैर-आदिवासी के कब्जे में किस तरह पहुंची।
डिवीजन बेंच ने 1 सितंबर 2026 के फैसले में अपील खारिज करते हुए सिंगल बेंच के 20 मार्च 2024 के आदेश को बरकरार रखा। साथ ही एसडीओ, कलेक्टर और कमिश्नर स्तर पर पारित आदेशों को भी कायम रखा गया।
Chhattisgarh High Court:-क्या है पूरा मामला?
मामला ग्राम नया बाराद्वार की सर्वे नंबर 665/1 की 0.29 एकड़ जमीन से जुड़ा है। रिकॉर्ड के मुताबिक यह जमीन पहले लतीराम के नाम दर्ज थी। बाद में उनके बेटे धनीराम के नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हुई।
धनीराम ने 23 मई 1979 को 5 हजार रुपये में जमीन का रजिस्टर्ड बिक्री विलेख आदिवासी समुदाय के फिरतू राम के पक्ष में किया था। फिरतू राम की मृत्यु के बाद जमीन गोकुल राम के नाम दर्ज हुई। गोकुल राम की मृत्यु के बाद उनके कानूनी वारिस इस मामले में अपीलकर्ता बने।
Chhattisgarh High Court:-शिकायत में क्या आरोप लगाया गया?
जानकी बाई ने छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 170-B के तहत शिकायत की थी। उनका कहना था कि राजस्व रिकॉर्ड में जमीन आदिवासी व्यक्तियों के नाम दर्ज होने के बावजूद उसका वास्तविक कब्जा और उपयोग गैर-आदिवासी लखनलाल राठौर के पास है।
शिकायत के बाद राजस्व अधिकारियों ने मामले की जांच शुरू की। एसडीओ ने पटवारी रिपोर्ट, पक्षकारों को नोटिस, उनके बयान और गवाहों के कथनों सहित उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर कार्रवाई की।
Chhattisgarh High Court:-पहले भी हुआ था जमीन वापस करने का आदेश
जांच के बाद एसडीओ ने 30 मार्च 1998 को जमीन आदिवासी पक्ष को वापस करने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ अपील के बाद कलेक्टर ने मामले को दोबारा सुनवाई के लिए भेजा।
पुनः सुनवाई के बाद एसडीओ ने 11 फरवरी 2003 को फिर जमीन आदिवासी पक्ष को वापस करने का आदेश दिया। इसके बाद कलेक्टर ने 3 मार्च 2004 और कमिश्नर ने 30 नवंबर 2009 को एसडीओ के आदेश को बरकरार रखा। बाद में राजस्व बोर्ड में की गई चुनौती भी सफल नहीं हुई।
Chhattisgarh High Court:-हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि जब जमीन का रजिस्टर्ड बिक्री विलेख आदिवासी व्यक्ति के नाम है, तो क्या धारा 170-B के तहत उसके वास्तविक कब्जे और उपयोग की जांच की जा सकती है?
कोर्ट ने इसका जवाब हां में दिया। अदालत ने माना कि धारा 170-B की कार्यवाही का उद्देश्य केवल राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नाम देखना नहीं है, बल्कि यह पता लगाना भी है कि जमीन पर वास्तव में किसका कब्जा और उपयोग है।
कोर्ट ने यह भी माना कि मामले में राजस्व अधिकारियों ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर जांच की थी और अपीलकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि निचली अदालत या राजस्व अधिकारियों के आदेश में ऐसी गंभीर कानूनी गलती थी, जिसके कारण हाईकोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़े।
Chhattisgarh High Court:-धारा 170-B क्यों महत्वपूर्ण है?
छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 170-B आदिवासी भूमि को ऐसे कब्जे या लेनदेन से सुरक्षा देने के लिए महत्वपूर्ण प्रावधान है, जिनसे आदिवासी व्यक्ति अपने वैध भूमि अधिकार से वंचित हो सकता है।
हाईकोर्ट के पुराने फैसलों में भी इस प्रावधान के उद्देश्य को व्यापक बताते हुए कहा गया है कि जांच का मकसद यह पता लगाना है कि आदिवासी भूमि किस तरह ऐसे व्यक्ति के कब्जे में पहुंची, जिसे उस पर वैध अधिकार नहीं है।
Chhattisgarh High Court:-कोर्ट के फैसले का सीधा मतलब
सिर्फ कागजों में नाम होना पर्याप्त नहीं है। यदि किसी आदिवासी के नाम दर्ज भूमि पर गैर-आदिवासी के वास्तविक कब्जे या उपयोग का आरोप है, तो राजस्व अधिकारी धारा 170-B के तहत परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच कर सकते हैं।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर रजिस्टर्ड बिक्री विलेख अपने आप अवैध हो जाता है। धारा 170-B की कार्रवाई मामले के तथ्यों, लेनदेन की प्रकृति, कब्जे और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच पर निर्भर करती है।
