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PNGRB:-पेट्रोल के बाद अब रसोई गैस की बारी! PNG में 5% हाइड्रोजन मिलाने का प्रस्ताव, क्या महंगा होगा किचन का बजट?

PNGRB:- पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग के बाद अब घरों में पाइपलाइन के जरिए पहुंचने वाली रसोई गैस में भी हाइड्रोजन मिलाने की तैयारी है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड (PNGRB) ने घरेलू पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) में अधिकतम 5 प्रतिशत तक हाइड्रोजन मिलाने के लिए ड्राफ्ट गाइडलाइंस जारी की हैं। इस पहल का उद्देश्य स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना और प्राकृतिक गैस के आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में काम करना है। हालांकि, हाइड्रोजन की मौजूदा लागत को देखते हुए सवाल उठ रहा है कि इस बदलाव का असर आम उपभोक्ताओं के गैस बिल पर पड़ेगा या नहीं।

PNGRB:-क्या है सरकार की तैयारी?

PNGRB की प्रस्तावित गाइडलाइंस के मुताबिक, घरेलू PNG नेटवर्क में प्राकृतिक गैस के साथ अधिकतम 5 प्रतिशत हाइड्रोजन मिलाने की व्यवस्था बनाई जा सकती है। इसके लिए संबंधित गैस वितरण कंपनियों को तकनीकी जांच, सुरक्षा मानकों और नियामकीय मंजूरी जैसी आवश्यक शर्तों का पालन करना होगा।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि 5 प्रतिशत हाइड्रोजन मिलाने का प्रस्ताव अभी ड्राफ्ट स्तर पर है। इसका मतलब यह नहीं है कि देशभर के घरों में इसकी आपूर्ति शुरू हो गई है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत शुरुआत चुनिंदा नेटवर्क और निर्धारित तकनीकी शर्तों के साथ किए जाने की संभावना है।

इस मसौदे पर संबंधित पक्षों से 12 नवंबर 2026 तक सुझाव और आपत्तियां मांगी गई हैं। इसके बाद नियमों को अंतिम रूप देने और जरूरी मंजूरियां मिलने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।

PNGRB:-हाइड्रोजन मिलाने की जरूरत क्यों?

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयातित तेल और प्राकृतिक गैस पर काफी हद तक निर्भर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव और पश्चिम एशिया में तनाव जैसी परिस्थितियां ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित कर सकती हैं।

ऐसे में हाइड्रोजन को प्राकृतिक गैस के साथ मिलाना वैकल्पिक ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ाने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है। खासकर ग्रीन हाइड्रोजन, जिसे नवीकरणीय ऊर्जा की मदद से तैयार किया जाता है, स्वच्छ ऊर्जा व्यवस्था विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

हालांकि, हाइड्रोजन ब्लेंडिंग से आयात पर निर्भरता कितनी कम होगी, यह इस्तेमाल होने वाली हाइड्रोजन की मात्रा, उत्पादन लागत और परियोजनाओं के विस्तार पर निर्भर करेगा।

PNGRB:-क्या महंगी हो जाएगी रसोई गैस?

इस प्रस्ताव से जुड़ी सबसे बड़ी चिंता इसकी लागत है। सरकारी निविदाओं में ग्रीन हाइड्रोजन की कीमत करीब 387 से 397 रुपये प्रति किलोग्राम बताई गई है। वहीं, ऊर्जा के बराबर आधार पर इसकी लागत लगभग 2,880 से 2,950 रुपये प्रति MMBtu आंकी गई है। यह अक्टूबर 2026 के लिए बताए गए घरेलू प्राकृतिक गैस के बेंचमार्क मूल्य से करीब 2.7 गुना अधिक है।

इस अंतर के कारण गैस वितरण कंपनियों की लागत बढ़ने की आशंका है। हालांकि, इसका पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर ही डाला जाएगा, यह अभी तय नहीं है। कंपनियां अतिरिक्त लागत खुद वहन करती हैं या इसका कुछ हिस्सा ग्राहकों तक पहुंचता है, यह भविष्य के नियामकीय फैसलों और मूल्य निर्धारण व्यवस्था पर निर्भर करेगा।

इसलिए फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि PNG उपभोक्ताओं का बिल निश्चित रूप से बढ़ने वाला है। वास्तविक असर जानने के लिए अंतिम नियमों और मूल्य निर्धारण से जुड़े फैसलों का इंतजार करना होगा।

PNGRB:-सुरक्षा और गैस बिलिंग पर भी रहेगा ध्यान

हाइड्रोजन के इस्तेमाल के लिए मौजूदा पाइपलाइन नेटवर्क, उपकरणों और गैस की गुणवत्ता की तकनीकी जांच जरूरी है। इसके अलावा, मिश्रित गैस की आपूर्ति के दौरान सुरक्षा व्यवस्था, मीटरिंग, बिलिंग और शिकायतों के निपटारे को लेकर भी स्पष्ट नियमों की आवश्यकता होगी।

PNGRB के मसौदे में इन पहलुओं पर जोर दिया गया है। जरूरत पड़ने पर नियामक सुरक्षा संबंधी चिंताओं के आधार पर हाइड्रोजन मिश्रण की मात्रा कम करने या आपूर्ति रोकने जैसे कदम भी उठा सकता है।

एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू गैस की ऊष्मीय क्षमता यानी उससे मिलने वाली ऊर्जा का है। हाइड्रोजन और प्राकृतिक गैस की ऊर्जा विशेषताएं अलग-अलग होती हैं, इसलिए उपभोक्ताओं की बिलिंग में गैस की वास्तविक ऊर्जा मात्रा को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण होगा।

PNGRB:-क्या तुरंत लागू हो जाएगी नई व्यवस्था?

नहीं। ड्राफ्ट गाइडलाइंस जारी होने का मतलब यह नहीं है कि नई व्यवस्था को तत्काल देशभर में लागू कर दिया गया है। पहले सुझावों और आपत्तियों पर विचार, अंतिम दिशा-निर्देश, आवश्यक कानूनी प्रावधान और संबंधित मंजूरियां जरूरी होंगी। इसके बाद ही तय होगा कि किन नेटवर्क में और किस समय से हाइड्रोजन मिश्रित PNG की आपूर्ति की जा सकती है।

PNGRB पहले भी देश के अलग-अलग हिस्सों में प्राकृतिक गैस के साथ हाइड्रोजन मिलाने की पायलट परियोजनाओं को मंजूरी दे चुका है। ऐसे परीक्षणों से तकनीकी सुरक्षा और बड़े स्तर पर इस्तेमाल की संभावनाओं का आकलन किया जा रहा है।

फिलहाल आम PNG उपभोक्ताओं के लिए सबसे अहम सवाल यही है कि स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में उठाए जा रहे इस कदम की लागत कौन उठाएगा। इसका स्पष्ट जवाब अंतिम नियमों और भविष्य की मूल्य निर्धारण व्यवस्था सामने आने के बाद ही मिल सकेगा।

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