Madras High Court News:-पति का दूसरी महिला से अफेयर, फिर भी नहीं माना जाएगा क्रूरता का अपराध? मद्रास हाई कोर्ट का अहम फैसला

Madras High Court News:- पति के विवाहेतर संबंध को लेकर मद्रास हाई कोर्ट ने अहम कानूनी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि पति का किसी दूसरी महिला के साथ अवैध संबंध होना मात्र भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत पत्नी के प्रति क्रूरता का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अभियोजन पक्ष को क्रूरता के अन्य आवश्यक तत्वों और परिस्थितियों के समर्थन में पर्याप्त सबूत पेश करने होंगे। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि विवाहेतर संबंध से जुड़ा व्यवहार किसी भी परिस्थिति में क्रूरता नहीं माना जा सकता।
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Madras High Court News:- क्या है पूरा मामला?
यह मामला एक विवाहित महिला और उसके पति से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, महिला की शादी सितंबर 2008 में हुई थी। आरोप था कि पति दहेज की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित करता था और उसका किसी दूसरी महिला के साथ संबंध भी था।
आरोपों के मुताबिक, महिला ने अपने डेढ़ साल के बच्चे के साथ पानी में कूदकर आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद पति के खिलाफ क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित धाराओं के तहत मामला चला।
Madras High Court News:- ट्रायल कोर्ट ने क्यों किया था पति को बरी?
23 अप्रैल 2018 को ट्रायल कोर्ट ने पति को आरोपों से बरी कर दिया था। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष दहेज की मांग और ऐसी क्रूरता के आरोपों को पर्याप्त सबूतों के आधार पर साबित नहीं कर सका, जो महिला को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने वाली हो।
इसके बाद मृतका के भाई ने पति को बरी किए जाने के फैसले को मद्रास हाई कोर्ट में चुनौती दी।
Madras High Court News:- हाई कोर्ट ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सुंदर मोहन ने कहा कि पति के विवाहेतर संबंध का साबित होना अपने आप में IPC की धारा 498A के तहत आपराधिक क्रूरता स्थापित नहीं करता। कोर्ट के अनुसार, यह देखना जरूरी है कि संबंधित आचरण किस प्रकृति का था और क्या अभियोजन पक्ष ने अपराध के लिए जरूरी अन्य तत्वों को भी साबित किया है।
हाई कोर्ट ने यह भी पाया कि दहेज उत्पीड़न के आरोपों में पर्याप्त ठोस आधार नहीं था। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने पति को बरी किए जाने के खिलाफ दायर अपील खारिज कर दी।
Madras High Court News:- सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का भी दिया संदर्भ
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के Pinakin Mahipatray Rawal बनाम State of Gujarat फैसले का सिद्धांत भी प्रासंगिक है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि केवल विवाहेतर संबंध के आधार पर यह मान लेना पर्याप्त नहीं है कि पति ने पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाया या उसके साथ कानून में परिभाषित क्रूरता की।
हालांकि, यदि अन्य सबूत यह दिखाते हैं कि पति का व्यवहार मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना के कानूनी मानकों को पूरा करता है, तो परिस्थितियों के आधार पर आपराधिक जिम्मेदारी तय की जा सकती है।
Madras High Court News:- क्या इस फैसले का मतलब है कि अफेयर पर कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती?
इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि पति का विवाहेतर संबंध हर स्थिति में कानूनी रूप से अप्रासंगिक है। अदालत ने आपराधिक क्रूरता के आरोप को साबित करने के लिए जरूरी कानूनी मानकों पर जोर दिया है।
IPC की धारा 498A के तहत क्रूरता साबित करने के लिए संबंधित कानूनी शर्तों और साक्ष्यों का होना जरूरी है। वहीं, आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में भी अभियोजन पक्ष को कानून के अनुसार आवश्यक तत्व साबित करने होते हैं।
