अधयात्म

Dussehra 2026:-दशहरे पर कहीं रावण की पूजा, तो कहीं मनाया जाता है शोक! जानिए भारत की 8 अनोखी परंपराएं

Dussehra 2026:-देशभर में जहां रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, वहीं भारत में कुछ ऐसी जगहें भी हैं, जहां रावण को जलाने के बजाय उसकी पूजा की जाती है। कहीं उसे भगवान शिव का परम भक्त और महान विद्वान माना जाता है, तो कहीं उसके साथ पारिवारिक रिश्ता जुड़ा होने की मान्यता है। छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी दशहरे की परंपरा देश के दूसरे हिस्सों से बिल्कुल अलग है। आइए जानते हैं इन अनोखी परंपराओं के बारे में।

देश में दशहरे का त्योहार अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के साथ मनाया जाता है। आमतौर पर इस दिन भगवान श्रीराम की रावण पर विजय की स्मृति में रावण दहन किया जाता है। हालांकि, कुछ क्षेत्रों में प्रचलित स्थानीय मान्यताएं रावण के दूसरे पहलुओं को महत्व देती हैं। इन जगहों पर उसे विद्वान, शिवभक्त, पूर्वज या परिवार से जुड़े व्यक्ति के रूप में देखा जाता है।

1. बिसरख, उत्तर प्रदेश: रावण की जन्मस्थली मानकर होती है पूजा

उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा के पास स्थित बिसरख गांव रावण से जुड़ी मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि रावण का जन्म इसी गांव में हुआ था। इस मान्यता के अनुसार, रावण के पिता ऋषि विश्रवा का संबंध भी इसी स्थान से था।

यहां रावण को केवल रामायण के प्रतिपक्षी के रूप में नहीं, बल्कि विद्वान और भगवान शिव के परम भक्त के रूप में भी देखा जाता है। इसी कारण दशहरे के अवसर पर रावण का पुतला जलाने के बजाय पूजा-पाठ, हवन और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। हालांकि, रावण का जन्मस्थान होने का दावा स्थानीय धार्मिक मान्यता है, प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य नहीं।

2. मंदसौर, मध्य प्रदेश: रावण को मानते हैं दामाद

मध्य प्रदेश का मंदसौर रावण से जुड़ी एक दिलचस्प परंपरा के लिए जाना जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, रावण की पत्नी मंदोदरी का संबंध इसी क्षेत्र से था। इस कारण कुछ समुदाय रावण को अपना दामाद मानकर सम्मान देते हैं।

मंदसौर के खानपुर क्षेत्र में रावण की प्रतिमा भी स्थित है। यहां रावण को लेकर श्रद्धा और सम्मान की परंपरा देखने को मिलती है। यह मान्यता देश के उन हिस्सों से अलग है, जहां दशहरे पर रावण के पुतले का दहन प्रमुख आयोजन होता है।

3. मंडोर और जोधपुर, राजस्थान: रावण के लिए मनाया जाता है शोक

राजस्थान के जोधपुर और मंडोर क्षेत्र में भी रावण से जुड़ी विशिष्ट परंपराएं प्रचलित हैं। स्थानीय लोकमान्यताओं में मंडोदरी का संबंध मंडोर से जोड़ा जाता है। इसी आधार पर कुछ ब्राह्मण समुदाय रावण को अपना पूर्वज या परिवार से जुड़ा व्यक्ति मानते हैं।

दशहरे के अवसर पर कुछ परिवार रावण दहन में शामिल होने के बजाय उसके निधन पर शोक व्यक्त करते हैं और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। यह परंपरा बताती है कि रामायण के पात्रों को लेकर अलग-अलग समुदायों की सांस्कृतिक धारणाएं एक-दूसरे से भिन्न हो सकती हैं।

4. रावण गांव, विदिशा, मध्य प्रदेश: ‘रावण बाबा’ के रूप में पूजा

मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के रावण गांव में रावण को ‘रावण बाबा’ के नाम से पूजा जाता है। यहां स्थापित रावण की प्रतिमा स्थानीय आस्था का प्रमुख केंद्र है।

स्थानीय परंपरा में रावण को भगवान शिव का भक्त और शक्तिशाली व्यक्तित्व माना जाता है। दशहरे पर पुतला जलाने के बजाय पूजा-अर्चना और अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। इस गांव की परंपरा उन स्थानों में शामिल है, जहां रावण को लेकर प्रचलित मान्यताएं सामान्य रावण दहन से अलग हैं।

5. कानपुर, उत्तर प्रदेश: साल में एक दिन खुलता है दशानन मंदिर

उत्तर प्रदेश के कानपुर के शिवाला क्षेत्र में स्थित दशानन मंदिर रावण पूजा के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर की खास बात यह है कि इसके कपाट साल में केवल विजयादशमी के दिन खोले जाते हैं।

20 अक्टूबर 2026 को भी इस मंदिर में रावण की पूजा-अर्चना की परंपरा चर्चा में है। मंदिर में श्रद्धालु रावण की प्रतिमा का अभिषेक करते हैं, दीप जलाते हैं और आरती करते हैं। मंदिर से जुड़ी परंपरा में रावण की विद्वता और भगवान शिव के प्रति उसकी भक्ति को विशेष महत्व दिया जाता है।

जहां एक ओर शहर के कई हिस्सों में रावण दहन होता है, वहीं दूसरी ओर इस मंदिर में उसी दिन रावण की पूजा की जाती है। यही विरोधाभास कानपुर की इस परंपरा को खास बनाता है।

6. बैजनाथ, हिमाचल प्रदेश: रावण की शिवभक्ति से जुड़ी मान्यता

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित बैजनाथ भगवान शिव के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में इस क्षेत्र को रावण की शिवभक्ति और तपस्या से जोड़ा जाता है।

यहां दशहरे के दौरान रावण दहन की परंपरा सामान्य रूप से नहीं निभाई जाती। हालांकि, इस परंपरा को रावण की अलग से व्यापक पूजा के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा। इसका संबंध मुख्य रूप से भगवान शिव के प्रति रावण की भक्ति से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं से है।

7. श्रीलंका: रावण को लेकर अलग-अलग सांस्कृतिक धारणाएं

श्रीलंका में रावण का नाम रामायण की कथा के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। वहां रावण से संबंधित कई लोककथाएं, ऐतिहासिक दावे और सांस्कृतिक धारणाएं प्रचलित हैं। कुछ लोग उसे शक्तिशाली राजा, कुशल शासक या भगवान शिव के भक्त के रूप में देखते हैं।

हालांकि, श्रीलंका के सभी लोगों की रावण के प्रति एक जैसी धारणा नहीं है और वहां रावण पूजा की कोई एक समान राष्ट्रीय परंपरा भी नहीं है। इसलिए श्रीलंका को ऐसे देश के रूप में देखना अधिक उचित होगा, जहां रावण की विरासत को लेकर विविध विचार मौजूद हैं, न कि ऐसा स्थान जहां हर जगह उसकी पूजा होती है।

8. बस्तर, छत्तीसगढ़: 75 दिनों तक चलने वाला अनोखा दशहरा

छत्तीसगढ़ के बस्तर का दशहरा देश के सबसे अनोखे सांस्कृतिक आयोजनों में शामिल है। जगदलपुर केंद्रित यह पर्व लगभग 75 दिनों तक चलने वाली परंपराओं, धार्मिक अनुष्ठानों और आदिवासी संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है।

बस्तर दशहरे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। लेकिन इसकी वजह रावण की पूजा करना नहीं है। बस्तर का दशहरा मुख्य रूप से मां दंतेश्वरी की आराधना, स्थानीय देवी-देवताओं की परंपराओं और आदिवासी संस्कृति से जुड़ा हुआ है।

भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल और बस्तर जिला प्रशासन के अनुसार, इस पर्व का स्वरूप देश के अन्य हिस्सों में मनाए जाने वाले राम-रावण विजय प्रसंग वाले दशहरे से अलग है। यहां रथ परंपरा, देवी-देवताओं का आगमन और सामुदायिक अनुष्ठान विशेष महत्व रखते हैं।

इस वर्ष 2026 में बस्तर दशहरे का मुख्य चरण 18 से 22 अक्टूबर तक निर्धारित है। 20 अक्टूबर को भी यहां की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं इस अनूठे पर्व का हिस्सा हैं।

Dussehra 2026:-भारत में रावण को लेकर अलग-अलग मान्यताएं क्यों हैं?

रावण को लेकर प्रचलित इन परंपराओं के पीछे स्थानीय इतिहास, धार्मिक आस्था, लोककथाएं और सामुदायिक पहचान जैसे कई पहलू हैं। अधिकांश स्थानों पर रावण की विद्वता और शिवभक्ति को महत्व दिया जाता है, जबकि कुछ समुदायों में उससे पारिवारिक या वंशगत संबंध होने की मान्यता प्रचलित है।

वहीं, बस्तर का उदाहरण यह स्पष्ट करता है कि हर जगह रावण दहन नहीं होने का अर्थ रावण की पूजा होना नहीं है। कई क्षेत्रों में दशहरे का स्वरूप स्थानीय देवी-देवताओं और सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार विकसित हुआ है।

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