छत्तीसगढ़

CG News:-बिलासपुर में 5 करोड़ का लोन घोटाला! 11 फर्मों के नाम पर बैंक को लगाया चूना, तत्कालीन मैनेजर समेत दो पर शिकंजा

CG News:-छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में बैंक लोन के नाम पर करोड़ों रुपये की कथित धोखाधड़ी का बड़ा मामला सामने आया है। बैंक ऑफ बड़ौदा की राजकिशोर नगर शाखा से 11 अपात्र और कथित फर्जी फर्मों के नाम पर 5 करोड़ रुपये से अधिक का लोन स्वीकृत कराने के मामले में आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने जांच पूरी कर ली है। एजेंसी ने 30 अक्टूबर 2026 को बिलासपुर की विशेष अदालत में तत्कालीन वरिष्ठ शाखा प्रबंधक राहुल कुमार सिन्हा और विश्वजीत भौमिक के खिलाफ चालान पेश किया है।

इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिन फर्मों के नाम पर करोड़ों रुपये का लोन स्वीकृत हुआ, जांच के दौरान उनके बताए गए पतों पर कोई वास्तविक कारोबार नहीं मिला।

CG News:-11 फर्मों को लोन, एक ही साल में खाते हो गए NPA

मामले की शुरुआत बैंक ऑफ बड़ौदा के क्षेत्रीय कार्यालय रायपुर की शिकायत से हुई थी। शिकायत के आधार पर 28 जनवरी 2020 को अपराध दर्ज किया गया।

जांच एजेंसी के अनुसार, 20 मार्च 2018 से 3 मई 2019 के बीच तत्कालीन वरिष्ठ शाखा प्रबंधक राहुल कुमार सिन्हा ने बैंक के निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं का कथित उल्लंघन करते हुए 11 अपात्र फर्मों को कैश क्रेडिट, ओवरड्राफ्ट, बैंक गारंटी और टर्म लोन जैसी सुविधाएं स्वीकृत की थीं।

हैरानी की बात यह है कि सभी 11 ऋण खाते वर्ष 2019 में ही गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) घोषित हो गए। लोन की रकम वापस नहीं मिलने से बैंक को 5 करोड़ 4 लाख 15 हजार रुपये की आर्थिक क्षति होने का आरोप है।

CG News:-आधार-पैन लेकर बना दीं फर्में, लोगों को भनक तक नहीं!

जांच में विश्वजीत भौमिक की भूमिका को लेकर कई गंभीर आरोप सामने आए हैं। एजेंसी के मुताबिक, भौमिक बिलासपुर के जरहाभाठा स्थित उड़ान माइक्रो फाइनेंस कार्यालय से लोगों को छोटे ऋण और बैंक लोन दिलाने का काम करता था।

इस दौरान वह लोगों से आधार कार्ड, पैन कार्ड, केवाईसी दस्तावेज और संपत्ति के मूल कागजात प्राप्त करता था। आरोप है कि बैंक के फॉर्म और खाली चेकों पर भी हस्ताक्षर कराए जाते थे।

जांच एजेंसी का दावा है कि इन्हीं दस्तावेजों के सहारे संबंधित व्यक्तियों की जानकारी के बिना उनके नाम पर फर्में बनाई गईं। कुछ फर्मों में कर्मचारियों को ही मालिक दर्शा दिया गया।

जांच में तीन फर्मों के दुकान एवं स्थापना पंजीयन प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाने और सात फर्मों के जीएसटी रिटर्न उड़ान माइक्रो फाइनेंस कार्यालय से दाखिल होने की बात भी सामने आई है।

CG News:-कागजों पर कारोबार, जमीन पर नहीं मिली दुकान!

मामले में तत्कालीन बैंक प्रबंधक की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। जांच एजेंसी का आरोप है कि ऋण स्वीकृत करने से पहले फर्मों के पते और कारोबार की वास्तविक स्थिति का सही सत्यापन नहीं किया गया।

इसके बजाय निरीक्षण रिपोर्ट में गलत जानकारी दर्ज की गई। कुछ मामलों में ऐसे लोगों की संपत्तियों को भी बंधक के रूप में स्वीकार किया गया, जिनका संबंधित ऋण से कोई संबंध नहीं था और जिन्हें इसकी जानकारी तक नहीं थी।

बाद में जब बैंक की ओर से निरीक्षण किया गया, तो बताए गए पतों पर संबंधित फर्मों की कोई व्यावसायिक इकाई नहीं मिली।

CG News:-लोन की रकम कहां गई? जांच में सामने आया बड़ा खुलासा

EOW-ACB की जांच के अनुसार, बैंक से प्राप्त ऋण राशि का इस्तेमाल संबंधित फर्मों के वास्तविक कारोबार में नहीं किया गया। रकम को अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर कर निकाला गया।

एजेंसी ने विश्वजीत भौमिक को इस राशि का अंतिम लाभार्थी बताया है। जांच में यह भी सामने आया कि राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम (NSIC) के माध्यम से ऋण राशि भौमिक की फर्म ए.बी. फास्टनर्स तक पहुंचाई गई।

इसके अलावा कथित फर्जी बिलों के आधार पर NSIC रायपुर से भुगतान प्राप्त करने के आरोप भी लगाए गए हैं।

CG News:-छह साल बाद अदालत पहुंचा मामला, इन धाराओं में चालान

करीब छह साल की विवेचना के बाद EOW-ACB ने 30 अक्टूबर 2026 को विशेष न्यायालय (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम), बिलासपुर में चालान पेश किया।

दोनों आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467, 468 और 471 (जालसाजी तथा जाली दस्तावेजों के उपयोग) और 120-बी (आपराधिक षड्यंत्र) के साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 12 और 13(2) के तहत आरोप लगाए गए हैं।

मामले में आरोपी बनाए गए राहुल कुमार सिन्हा के वर्तमान में गुजरात के कच्छ जिले की बैंक ऑफ बड़ौदा की गढ़सीसा शाखा में वरिष्ठ प्रबंधक के पद पर पदस्थ होने की जानकारी दी गई है।

फिलहाल मामला अदालत में है। जांच एजेंसी ने दोनों के खिलाफ आरोपपत्र पेश किया है, लेकिन आरोपों पर अंतिम फैसला न्यायालय द्वारा किया जाना बाकी है।

यह मामला बैंकिंग व्यवस्था में ऋण स्वीकृति, दस्तावेज सत्यापन और संपत्ति के बंधक संबंधी प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है। साथ ही यह भी बताता है कि व्यक्तिगत दस्तावेजों का दुरुपयोग किस तरह बड़े वित्तीय अपराधों का आधार बन सकता है।

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